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Fruit Farming

स्प्रिंकलर तकनीक से ड्रैगन फ्रूट की खेती करने पर मिलेगी 80% फीसद छूट

स्प्रिंकलर तकनीक से ड्रैगन फ्रूट की खेती करने पर मिलेगी 80% फीसद छूट

भारत एक कृषि प्रधान देश है। भारत के 70% फीसद से ज्यादा लोग खेती किसानी से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संलग्न हैं। देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के किसानों की मदद हेतु केन्द्र और राज्यों की सरकार हर संभव प्रयास करती हैं। 

इसको लेकर सरकार विभिन्न प्रकार की योजनाएं चलाती है। साथ ही, किसानों को अनुदान भी प्रदान किया जाता है। इसी कड़ी में सरकार ड्रैगन फ्रूट की खेती में सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर तकनीक का इस्तेमाल करने वाले कृषकों को 80% फीसद तक का अनुदान दिया जा रहा है।

स्प्रिंकलर तकनीक से ड्रैगन फ्रूट की अच्छी उपज मिलेगी 

भारत में ड्रैगन फ्रूट की खेती बड़ी ही तेजी से लोकप्रिय होती जा रही है। हालांकि, यह फल मुख्य रूप से थाईलैंड, इजरायल, वियतनाम और श्रीलंका जैसे देशों में काफी प्रसिद्ध है। 

लेकिन, वर्तमान में इसे भारत के लोगों द्वारा भी बेहद पसंद किया जा रहा है। यदि आप ड्रैगन फ्रूट की खेती करते हैं अथवा फिर करने की योजना बना रहे हैं, तो आप ड्रैगन फ्रूट की खेती में सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अवश्य करें। 

ड्रैगन फ्रूट की खेती में इस तकनीक का उपयोग करने से आपके खेतों में फसल की उपज काफी बढ़ेगी। स्प्रिंकलर तकनीक का इस्तेमाल करने के लिए सरकार की ओर से 80% प्रतिशत तक का अनुदान दिया जाएगा।

ड्रैगन फ्रूट सेहत के लिए अत्यंत लाभकारी है 

फल हमारे स्वास्थ के लिए अत्यंत लाभकारी होते हैं। ड्रैगन फ्रूट का सेवन करने से आपको विभिन्न प्रकार के स्वास्थ से संबंधित लाभ मिलते हैं। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि ड्रैगन फ्रूट के अंदर भरपूर मात्रा में Vitamin C पाया जाता है। 

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इसका सेवन करने से इम्यून सिस्टम भी बेहद मजबूत होता है। इसके अलावा ड्रैगन फ्रूट का सेवन करने से मधुमेह को काबू में रखा जा सकता है। साथ ही, आपको इससे कॉलेस्ट्रोल में भी अत्यंत लाभ मिल सकता है। ड्रैगन फ्रूट एक ऐसा फल है, जिसमें फैट और प्रोटीन की मात्रा बेहद कम पाई जाती है।

ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए कितनी सब्सिडी दी जा रही है 

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि बिहार सरकार उद्यान निदेशालय ने किसानों के लिए एकीकृत बागवानी विकास मिशन योजना का शुभारंभ किया है। इस योजना के अंतर्गत ड्रैगन फ्रूट की खेती करने वाले कृषकों को सरकार की ओर से प्रति इकाई लागत (1.25 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर) का 40% अनुदान दिया जाएगा। 

इस हिसाब से ड्रैगन फ्रूट की खेती करने वाले किसानों को अनुदान के तौर पर 40% प्रतिशत यानी 50 हजार रुपये मिलेंगे। 

योजना का लाभ उठाने के लिए आवेदन यहां करें 

यदि आप बिहार राज्य में रहते हैं और इस योजना का लाभ उठाना चाहते हैं, तो बिहार कृषि विभाग, उद्यान निदेशालय की ऑफिसियल वेबसाइट horticulture.bihar.gov.in पर आवेदन कर सकते हैं।

ड्रैगन फ्रूट की खेती करके लाखों कमा रहे किसान

ड्रैगन फ्रूट की खेती करके लाखों कमा रहे किसान

हमारे यूजर श्री संजय शर्मा जी, राकेश कुमार ग्राम कलुआ नगला, ने ड्रैगन फ्रूट के बारे में जानकारी मांगी थीड्रैगन फ्रूट मूलतः वियतनाम,थाईलैंड,इज़रायल और श्रीलंका में मशहूर है.या आप कह सकते हैं की वहीं से ये दुनियां में फैला है.ड्रैगन फ्रूट का पेड़ कैकटस प्रजाति का होता है। इसे कम उपजाऊ मिट्टी और कम पानी के साथ भी उगाया जा सकता है। इसको बीज के साथ भी उगाया जा सकता है लेकिन ये एक लम्बी और कठिन प्रक्रिया है इसको कटिंग के साथ उगाने की सलाह दी जाती है इसके फ्रूट से शरीर को कई पोषक तत्व मिलते हैं इसको खाने से मधुमेह, शरीर में दर्द और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करता है। इसमें एंटी ऑक्सीडेंट पाया जाता है जो की शरीर को कई तरह के रोगों से लड़ने में सहायता करता है। भारत में भी इसकी मांग बढ़ती जा रही है। इसलिए ड्रैगन फ्रूट की खेती भारत में भी बढ़ने लगी है।

लगाने का समय:

ड्रैगन फ्रूट को साल में दो बार लगाया जा सकता है एक फरवरी और सितम्बर के महीने में इसको लगाते समय ध्यान रखना चाहिए की मौसम ज्यादा गर्म न हो जिससे की पौधे को ज़माने में दिक्कत न हो। जैसा की हमने ऊपर बताया है इसकी कटिंग को लगाना ज्यादा अच्छा होता है और उसके जल्दी से फल आने की गारंटी होती है। इसके फल सितम्बर से दिसंबर तक आते हैं इनको 5 से 6 बार तोडा जाता है।

मिट्टी की सेहत:

इसको जैसा की हमने बताया है इसको किसी भी तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है दोमट मिटटी सबसे ज्यादा मुफीद होती है लेकिन क्योकि ये कैक्टस प्रजाति का पौधा है तो इसे कम उपजाऊ,पथरीली और कम पानी वाली जगह भी आसानी से उगाया जाता है। इसकी मिटटी में जल जमा नहीं होना चाहिए. ये पौधा कम पानी चाहता है. बेहतर होगा की इसको ऐसी जमीन में लगाया जाना चाहिए जहाँ पानी की निकासी की समुचित व्यवस्था हो और जहाँ पानी  का ठहराब न हो।

उपयुक्त जलवायु:

इसको बहुत ज्यादा तापमान भी बर्दास्त नहीं होता नहीं होता है तो इससे बचने के लिए इसके लिए छाया की व्यवस्था की जा सकती है. वैसे गर्मी से बचने के लिए इसमें समय समय पर पानी देना होता है. पानी देने के लिए ड्राप सिचांई ज्यादा अच्छी रहती है. एक बार कम तापमान में इसका पौधा जम जाये तो ये ज्यादा तापमान को भी झेल लेता है।

खेत की तैयारी:

इसके लिए खेत को समतल करके अच्छी जुताई करके 2 मीटर के अंतराल पर 2 X2 X2 फुट के गड्ढे बना देने चाहिए तथा इसको 15 दिन के लिए खुला छोड़ देना चाहिए जिससे की इसकी गर्मी निकल जाये उसके बाद इसमें गोबर की सूखी और बनी हुई खाद बालू , मिटटी और गोबर को बराबर के अनुपात में गड्ढे में भर देना चाहिए और कटिंग लगाने के बाद रोजाना शाम को ड्राप सिंचाई करनी चाहिए. ये पौधे को जमने में और बढ़ने में सहायता करता है।

ड्रैगन फ्रूट्स के प्रकार:

[caption id="attachment_2984" align="aligncenter" width="300"]Dragon fruit ड्रैगन फल[/caption] ड्रैगन फ्रूट्स ३ तरह के होते है. लाल रंग के गूदे वाला लाल रंग का फल , सफेद रंग के गूदे वाला पीले रंग का फल और सफेद रंग के गूदे वाला लाल रंग का फल. सभी तीनों तरह के फल भारत में उगाये जा सकते हैं. लेकिन लाल रंग के गूदे वाले लाल फल को भारत में ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है. लेकिन इसकी उपज बाजार की मांग के अनुरूप करनी चाहिए. इसका बजन सामान्यतः 300 ग्राम से 800 ग्राम तक होता है और इसके फल की तुड़ाई एक पेड़ से 3 से 4 बार होती है।

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रखरखाब:

  • इसके पेड़ को किसी सहारे की जरूरत होती है क्योकि जब पेड़ बढ़ता है तो ये अपना वजन सह नहीं पता है तो इसके पेड़ के पास कोई सीमेंटेड पिलर या लकड़ी गाड़ देनी चाहिए जो की इसके पेड़ का बजन सह सके।
  • आप ड्रैगन फलों के पौधों को कटिंग और बीज दोनों से उगा सकते हैं। हालांकि, बीज द्वारा ड्रैगन फल की सिफारिश नहीं की जाती है क्योंकि इसमें लंबा समय करीब करीब 5 साल का वक्त लग जाता है।
  • जब आप कटिंग से ड्रैगन फ्रूट उगाते हैं, तो 1 फुट लंबाई का 1 साल पुराना कटिंग लगाने के लिए बहुत उपयुक्त होता है।
  • ड्रैगन फ्रूट कुछ शेड को सहन कर सकता है और गर्म जलवायु परिस्थितियों को प्राथमिकता देता है। इसे ज्यादा पानी की जरूरत नहीं है.ड्रैगन फ्रूट प्लांट को मध्यम नम मिट्टी की आवश्यकता होती है जो कि ड्राप सिंचाई से पूरी कि जा सकती है.
  • आप फूल और फल आने के समय पानी की मात्रा बढ़ा सकते हैं। ड्रैगन फ्रूट कि खेती में ड्रिप सिंचाई ही सबसे उपयुक्त होती है।
  • ड्रैगन फल आसानी से बर्तन, कंटेनर, छत पर और घर के बगीचे के पिछवाड़े में उगाए जा सकते हैं.यदि आप कंटेनर को सूरज की रोशनी के लिए खिड़की के पास रखते हैं, तो ड्रैगन फलों को घर के अंदर उगाया जा सकता है।
  • ड्रैगन फलों के पौधों को दुनिया के उष्णकटिबंधीय या उपोष्णकटिबंधीय स्थानों में उगाया जा सकता है।
  • किसी भी अन्य फलों के पौधों की तरह, ड्रैगन फलों के पौधों को नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम के पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है।
  • ड्रैगन फ्रूट के पौधों को 40 ° C के तापमान तक सबसे अच्छा उगाया जा सकता है।

बाजार:

इसकी मांग वहां ज्यादा होती है जहाँ हेल्थ को लेकर लोग जागरूक होते है इसका मतलब है की आप इसको बड़े शहरों में बेच सकते हो जहाँ आपको इसकी अच्छी कीमत मिल जाएगी. इसका कीमत 150 से 250 रुपये किलो के हिसाब से होती है इसको अगर एक्सपोर्ट करना हो तो जैसे ही इसका रंग लाल होना शुरू हो तभी इसको तोड़ लेना चाहिए तथा ध्यान रहे की इसमें कोई निशान या किसी बजन से दबे नहीं, नहीं तो इसके ख़राब होने के चांस बढ़ जाते है।

रोग:

ड्रैगन फ्रूट में कोई रोग नहीं आता है अभी तक ऐसा कुछ रोग इसका मिला नहीं है हाँ लेकिन ध्यान रहे जब इसके फूल और फल आने का समय हो उस समय मौसम साफ और शुष्क होना चाहिए आद्रता वाले मौसम में फल पर दाग आने की संभावना रहती है. रखरखाब में सबसे ज्यादा इसको लगाने के समय पर जरूरत होती है।

खाद:

  • ड्रैगन फ्रूट्स को खाद की जरूरत ज्यादा होती है. ये एक गूदा वाला फल होता है तो इससे अच्छा और बड़ा फल लेने के लिए इसके  फलों के पौधों को नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम के पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है।
  • पौधे की उपलब्धता और बाजार के बारे में स्थान स्थान के हिसाब से बदल जाते हैं. इसके लिए बेहतर है की आप अपने क्षेत्र के कृषि अधिकारी से बात करें तथा पूरी जानकारी लेने के बाद ही इसकी खेती शुरी करें।
यह ड्रैगन फ्रूट ऐसा, जिसकी दुम पर पैसा

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यह ड्रैगन फ्रूट ऐसा, बीस साल तक बरसे पैसा : जानें ड्रैगन फ्रूट की जैविक खेती का राज

हम बात कर रहे हैें ड्रैगन फ्रूट (Dragon Fruit) की। इसे पिताया फल (
pitaya or pitahaya) के नाम से भी जाना जाता है। इसकी जैविक खेती करने वाले भारत के किसान मित्र भरपूर कमाई कर रहे हैं। लगभग बीस सालों तक किसान की कमाई का जरिया बने रहने वाले इस फ्रूट के और लाभ क्या हैं, कहां इसका बाजार है, इन विषयों पर हाजिर है पड़ताल।

ड्रैगन फ्रूट के लाभ

ड्रैगन फ्रूट लगाने से लाभ पक्का होने की वजह कई प्रदेशों के साथ ही विदेशों में इस स्पेशल फ्रूट की भारी डिमांड है। खास बात यह भी है कि, ड्रैगन फ्रूट लगाने के लिए किसानों को सरकारी मदद भी दी जाती है।

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जिले का उद्यान विभाग ड्रैगन फ्रूट की खेती के इच्छुक किसान को अनुदान प्रदान करता है। अनुदान योजना की शर्तें पूरी करने पर प्रति एकड़ के मान से किसान को ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए अनुदान दिया जाता है।

पैदावार बढ़ाने वाले कारक

ड्रैगन फ्रूट की ऑर्गेनिक खेती से लाभ है। वर्मी कंपोस्ट, जैविक खाद, गोमूत्र और नीम से बने कीटनाशक का इस्तेमाल ड्रैगन फ्रूट की उत्तम पैदावार में सहायक है। इसकी सिंचाई ड्रिप सिस्टम से होती है। खास बात यह है कि, जैसे-जैसे ड्रैगन फ्रूट का पेड़ पुराना होता जाता है, उसकी पैदावार क्षमता बढ़ती जाती है।

आयु 20 साल

ड्रैगन फ्रूट की आयु करीब 20 वर्षों से ज्यादा मानी गई है। इस अवधि के दौरान ड्रैगन फ्रूट का पेड़ न केवल खेत के लिए फायदेमंद साबित होता है बल्कि उसकी सेवा करने वाले किसान की भी तकदीर बदल देता है।

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देश और विदेश में है मांग

ड्रैगन फ्रूट की मांग देश और विदेश में है। उत्तरी राज्यों लखनऊ, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में इसका अच्छा बाजार है। इसके अलावा विदेशों में भी ड्रैगन फ्रूट का निर्यात किया जाता है।

खराब न होने की खासियत

ड्रैगन फ्रूट की खास बात ये है कि यह फल जल्दी खराब नहीं होता। ज्यादा समय तक खराब न होने के इस गुण के कारण ड्रैगन फ्रूट की पैदावार से किसान की कमाई के अवसर कई सालों तक सतत बरकरार रहते हैं।

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उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के हरदोई जिले में की जाने वाली इस स्पेशल फ्रूट की फार्मिंग किसानों के बीच चर्चा का विषय है। हरदोई के पहाड़पुर में इस स्पेशल फल की खेती की जा रही है। यहां के किसानों को लखनऊ में एक सेमिनार के दौरान ड्रैगन फ्रूट (Dragon Fruit) के फल को देखने का अवसर मिला था। इस फल की खेती और उससे मिलने वाले लाभों को जानकर वे इसकी खेती करने लिए आकर्षित हुए थे। ड्रैगन फ्रूट की खेती के बारे में सेमिनार से हासिल जानकारी जुटाने के बाद उन्होंने अपने खेत पर ड्रैगन फ्रूट की खेती करना शुरू कर दिया।

जिला उद्यान विभाग की मदद

जिला उद्यान विभाग की सहायता से किसानों ने ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की है। जिसमें सलाहकारी एवं आर्थिक मदद शामिल है।

सीमेंट का पोल

इसकी खेती के लिए सीमेंट के पोल के सहारे 4 पौधे लगाए जाते हैं, क्योंकि समय के साथ इसका पेड़ काफी वजनदार होता जाता है। ड्रैगन फ्रूट पेड़ों से उत्पादन क्रमशः बढ़ते हुए 25 से 30 किलो के आसपास पहुंच जाता है।

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उद्यान विभाग ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए किसानों को आर्थिक मदद प्रदान करता है। जिला उद्यान विभाग से ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए जरूरी जानकारी प्रदान की जाती है। जैविक खेती की मदद से इसकी सफल किसानी का खास मंत्र बताया जाता है। ड्रैगन फ्रूट पोषक तत्वों से भी भरपूर है। इस फल में फाइबर की प्रचुर मात्रा तो उपलब्ध है ही, साथ ही इसका व्यापक बाजार भी इसकी खेती के लिए किसानों को प्रेरित कर रहा है।
इस राज्य के किसान ने एक साथ विभिन्न फलों का उत्पादन कर रचा इतिहास

इस राज्य के किसान ने एक साथ विभिन्न फलों का उत्पादन कर रचा इतिहास

आज हम आपको गुरसिमरन सिंह नामक एक किसान की सफलता की कहानी बताने जा रहे हैं। बतादें, कि किसान गुरसिमरन ने अपने चार एकड़ के खेत में 20 से अधिक फलों का उत्पादन कर लोगों के समक्ष एक नजीर पेश की है। आज उनके फल विदेशों तक बेचे जा रहे हैं। पंजाब राज्य के मालेरकोटला जनपद के हटोआ गांव के युवा बागवान किसान गुरसिमरन सिंह अपनी समृद्ध सोच की वजह से जनपद के अन्य कृषकों के लिए भी प्रेरणा के स्रोत बन चुके हैं। यह युवा किसान गुरसिमरन सिंह अपनी दूरदर्शी सोच के चलते पंजाब के महान गुरुओं-पीरों की पवित्र व पावन भूमि का विस्तार कर रहे हैं। वह प्राकृतिक संसाधनों एवं पर्यावरण के संरक्षण हेतु अथक व निरंतर कोशिशें कर रहे हैं। साथ ही, समस्त किसानों एवं आम लोगों को प्रकृति की नैतिक एवं सामाजिक जिम्मेदारियों के तौर पर प्राकृतिक संसाधनों को बचाने हेतु संयुक्त कोशिशें भी कर रहे हैं।

किसान गुरसिमरन ने टिश्यू कल्चर में डिप्लोमा किया हुआ है

बतादें, कि किसान गुरसिमरन सिंह ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना से टिश्यू कल्चर में डिप्लोमा करने के पश्चात अपनी चार एकड़ की भूमि पर जैविक खेती के साथ-साथ विदेशी
फलों की खेती शुरु की थी। गुरसिमरन अपनी निजी नौकरी के साथ-साथ एक ही जगह पर एक ही मिट्टी से 20 प्रकार के विदेशी फल पैदा करने के लिए विभिन्न प्रकार के फलों के पेड़ लगाए थे। इससे उनको काफी ज्यादा आमदनी होने लगी थी। किसान गुरसिमरन सिंह के अनुसार, यदि इंसान के मन में कुछ हटकर करने की चाहत हो तो सब कुछ संभव होता है।

विदेशों तक के किसान संगठनों ने उनके अद्भुत कार्य का दौरा किया है

किसान गुरसिमरन की सफलता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है, कि पीएयू लुधियाना से सेवानिवृत्त डाॅ. मालविंदर सिंह मल्ली के नेतृत्व में ग्लोबल फोकस प्रोग्राम के अंतर्गत आठ देशों (यूएसए, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान, जर्मनी, न्यूजीलैंड, स्विटजरलैंड आदि) के बोरलॉग फार्मर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने किसान गुरसिमरन सिंह के अनूठे कार्यों का दौरा किया। यह भी पढ़ें: किसान इस विदेशी फल की खेती करके मोटा मुनाफा कमा सकते हैं

किसान गुरसिमरन 20 तरह के फलों का उत्पादन करते हैं

वह पारंपरिक फल चक्र से बाहर निकलकर जैतून, चीनी फल लोगान, नींबू, अमरूद, काले और नीले आम, जामुन, अमेरिकी एवोकैडो और अंजीर के साथ-साथ एल्फांजो, ब्लैक स्टोन, चोसा, रामकेला और बारामासी जैसे 20 तरह के फलों का उत्पादन करते हैं। किसान गुरसिमरन ने पंजाब में प्रथम बार सौ फल के पौधे लगाकर एक नई पहल शुरु की है। इसके अतिरिक्त युवा किसान ने जैविक मूंगफली, माह, चना, हल्दी, गन्ना, ज्वार,बासमती, रागी, सौंफ, बाजरा, देसी और पीली सरसों आदि की खेती कर स्वयं और अपने परिवार को पारंपरिक फसलों के चक्र से बाहर निकाला है। गुरसिमरन की इस नई सोच की वजह से जिले के किसानों ने भी अपने आर्थिक स्तर को ऊंचा उठाया है। साथ ही, लोगों को पारंपरिक को छोड़ नई कार्यविधि से खेती करने पर आमंत्रित किया है।
कटहल की खेती की सम्पूर्ण जानकारी (Jackfruit Farming Information In Hindi)

कटहल की खेती की सम्पूर्ण जानकारी (Jackfruit Farming Information In Hindi)

किसान भाइयों बहुत पुराने जमाने से एक कहावत चली आ रही है कि कटहल की खेती कभी गरीब नहीं होने देती यानी इसकी खेती से किसान धनी बन जाते हैं। 

वैसे तो इसे भारतीय जंगली फल या सब्जी कहा जाता है। इसके अलावा कटहल को मीट का विकल्प कहा जाता है। इसके कारण बहुत से लोग इसे पसंद नहीं करते हैं। 

इस बात की जानकारी बहुत कम लोगों को है कि ये कटहल अनेक बीमारियों में फायदा करता है। किसान भाइयों के लिए कटहल की खेती अब लाभकारी हो गयी है। 

इसका कारण यह है कि कटहल के कई ऐसी भी किस्में आ गयीं हैं जिनमें साल के बारहों महीने फल लगते हैं। इससे किसानों को पूरे साल कटहल से आमदनी मिलती रहती है। 

इसलिये किसानों के लिए कटहल की खेती नकदी फसल की तरह बहुत ही लाभकारी है।

कटहल से मिलने वाले लाभ

  1. कटहल में विटामिन ए, सी, थाइमिन, कैल्शियम, राइबोफ्लेविन, आयरन, जिंक आदि पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं
  2. कटहल का पल्प का जूस हार्ट की बीमारियों में लाभदायक होता है
  3. कटहल की पोटैशियम की मात्रा अधिक पायी जाती है जिससे ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहता है
  4. रेशेदार सब्जी व फल होने के कारण कटहल से एनीमिया रोग में लाभ मिलता है
  5. कटहल की जड़ उबाल कर पीने से अस्थमा रोग में लाभ मिलता है
  6. थायरायड रोगियों के लिए भी कटहल काफी लाभकारी होता है
  7. कटहल से हड्डियों को मजबूत करता है आॅस्टियोपोरोसिस के रोगों से बचाता है
  8. कटहल में विटामिन ए और सी पाये जाने के कारण वायरल इंफेक्शन में लाभ मिलता है
  9. अल्सर, कब्ज व पाचन संबंधी रोगों में भी कटहल फायदेमंद साबित होता है
  10. कटहल में विटामिन ए पाये जाने के कारण आंखों की रोशनी भी बढ़ती है।
कटहल से मिलने वाले लाभ
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व्यावसायिक लाभ

कटहल के उत्पादन से व्यावसायिक लाभ भी मिलते हैं। कटहल को हरा व पक्का बेचा जा सकता है। इसके हरे कटहल की सब्जी बनायी जाती है। 

इसके अलावा इसका अचार, पापड़ व जूस भी बनाया जाता है। कटहल का फल तो लाभकारी है और इसकी जड़ भी कई तरह की दवाओं के काम आती है।

कटहल की खेती किस प्रकार से की जाती है

आइये जानते हैं कि बहुउपयोगी कटहल की खेती या बागवानी कैसे की जाती है। इसके लिए आवश्यक भूमि, जलवायु, खाद, सिंचाई आदि के बारे में विस्तार से जानते हैं।

मिट्टी एवं जलवायु

कटहल की खेती वैसे तो सभी प्रकार की जमीन में हो जाती है लेकिन दोमट और बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त बताई जाती है। कटहल की खेती पीएच मान 6.5 से 7.5 वाली मृदा में भी की जा सकती है।

रेतीली जमीन में भी इसकी खेती की जा सकती है। समुद्र तल से 1000 मीटर ऊंचाई वाली पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी खेती की जा सकती है। जलभराव वाली जमीन में इसकी खेती से परहेज किया जाता है क्योंकि जलजमाव से कटहल की जड़ें गल जातीं हैं तथा पौधा गिर जाता है। 

कटहल की खेती शुष्क एवं शीतोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में आसानी से की जा सकती है। कटहल की खेती अत्यधिक सर्दी बर्दाश्त नहीं कर पाती है। 

दक्षिण भारत में कटहल की खेती अधिक होती है। इसके अलावा असम को कटहल की खेती के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।

कटहल की उन्नत किस्में

कटहल की उन्नत किस्मों में खजवा, गुलाबी, रुद्राक्षी, सिंगापुरी, स्वर्ण मनोहर, स्वर्ण पूर्ति, नरेन्द्र देव कृषि विश्वाविद्यालय की एनजे-1, एनजे-2, एनजे-15 एनजे-3 व केरल कृषि विवि की मुत्तम वरक्का प्रमुख हैं।

कटहल की खेती किस प्रकार से की जाती है

कटहल की रोपाई कैसे करें

कृषक बंधुओं को खेत या बाग की भूमि की अच्छी तरह से जुताई करके और पाटा करके समतल और भुरभुरी बना लेना चाहिये। उसके बाद 10 मीटर लम्बाई चौड़ाई में एक मीटर लम्बाई चौड़ाई और गहराई के थाले बना लेने चाहिये। 

प्रत्येक थालों के हिसाब से 20 से 25 किलो गोबर की खाद व कम्पोस्ट तथा 250 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 500 पोटाश, 1 किलोग्राम नीम की खली तथा 10 ग्राम थाइमेट को डालकर मिट्टी में अच्छी तरह से मिला लें।

रोपाई दो तरह से होती है

कटहल की रोपाई दो तरह से होती है। पहला बीजू और दूसरा कलमी तरीका होता है। बीजू रोपाई करने के लिए 40 एमएम की काली पॉलीथिन में पके हुए फल का बीज गोबर की खाद और रेत मिलाकर दबा देना चाहिये। 

दूसरे कलम की पौध नर्सरी से लाकर थाले के बीच एक फूट लम्बे चौड़े और डेढ़ फुट का गहरा गड्ढा बनाकर उसमें लगा देना चाहिये।

रोपाई का समय

रोपाई का सबसे अच्छा समय वर्षाकाल माना जाता है। वर्षाकाल में रोपाई करने से पानी की व्यवस्था अलग से नहीं करनी होती है। कटहल के पौधों की रोपाई करने का सबसे उपयुक्त समय अगस्त सितम्बर का होता है।

सिंचाई प्रबंधन

वर्षा के समय पौधों की रोपाई करने के बाद सिंचाई का विशेष ध्यान रखन होगा। यदि वर्षा हो रही है तो कोई बात नहीं यदि वर्षा न होतो प्रत्येक सप्ताह में सिंचाई करते रहना चाहिये। 

सर्दी के मौसम में प्रत्येक 15 दिन में सिंचाई करना आवश्यक होता है। दो से तीन साल तक पौधों की सिंचाई का विशेष ध्यान रखन होता है। जब पेड़ में फूल आने की संभावना दिखे तब सिंचाई नहीं करनी चाहिये।

पौधों की विशेष निगरानी

कटहल का पौधा लगाने के एक साल बाद तक विशेष निगरानी करते रहना चाहिये। समय समय पर थाले की निराई गुड़ाई करते रहना चाहिये। 

अगस्त सितम्बर माह में खाद व उर्वरक का प्रबंधन करते रहना चाहिये। इसके अलावा समय-समय पर सिंचाई की भी देखभाल करते रहना चाहिये। इसके अलावा पौधों की बढ़वार के लिए समय-समय पर कांट छांट भी की जानी चाहिये।

जड़ से पांच-छह फीट तक तनों व शाखाओं को काट कर पेड़ को सीधा बढ़ने देना चाहिये। उसके बाद चार-पांच तनों को फैलने देना चाहिये। इस तरह से पेड़ का ढांचा अच्छी तरह से विकसित हो जाता है तो अधिक फल लगते हैं।

खाद व उर्वरक प्रबंधन

कटहल के पेड़ में प्रत्येक वर्ष फल आते हैं, इसलिये अच्छे उत्पादन के लिए पेड़ों को खाद व उर्वरक उचित समय पर पर्याप्त मात्रा में देना चाहिये। 

प्रत्येक पौधे को 20 से 25 किलोग्राम गोबर की खाद, 100 ग्राम यूरिया, 200 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 100 ग्राम पोटाश प्रतिवर्ष बरसात के समय देना चाहिये। 

जब पौधों की उम्र 10 वर्ष हो जाये तो खाद व उर्वरकों की मात्रा बढ़ा देनी चाहिये। उस समय प्रति पौधे के हिसाब से 80 से 100 किलो तक गोबर की खाद, एक किलोग्राम यूरिया, 2 किलो सिंगल सुपर फास्फेट तथा एक किलो पोटाश देना चाहिये।

कीट-रोग व रोकथाम

कटहल की खेती में अनेक प्रकार के कीट एवं रोग व कीटजनित रोग लगते हैं। उनकी रोकथाम करना जरूरी होता है। आइये जानते हैं कीट प्रबंधन किस तरह से किया जाये। 

1. माहू : कटहल में लगने वाला माहू कीट पत्तियों, टहनियों, फूलों व फलों का रस चूसते हैं। इससे पौधों की बढ़वार रुक जाती है। 

जैसे ही इस कीट का संकेत मिले। वैसे ही इमिडाक्लोप्रिट 1 मिलीलीटर को एक लीटर पानी में मिलाकर घोल बनाकर छिड़काव करें।

2. तना छेदक: इस कीट के नवजात कीड़े कटहल के मोटे तने व डालियों मे छेद बनाकर घुस जात हैं और अंदर ही अंदर पेड़ को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे पेड़ सूखने लगता है तथा फसल पर विपरीत असर पड़ने लगता है। 

इसका पता लगते ही पेड़ में दिखने वाले छेद को अच्छी तरह से किसी पतले तार आदि से सफाई करना चाहिये फिर उसमें नुवाक्रान का तनाछेदक घोल 10 मिलीलीटर एक लीटर पेट्रोल या करोसिन में मिलाकर तेल की चार-पांच बूंद रुई में डालकर छेद को गीली चिकनी मिट्टी से बंद कर दें तो लाभ होगा। 

3. गुलाबी धब्बा : इस रोग से पत्तियों में नीचे की ओर से गुलाबी रंग का धब्बा बनने लगता है। इसकी रोकथाम के लिए कॉपर जनित फफूंदनाशी कॉपर आक्सीक्लोराइड या ब्लू कॉपर 3 मिली लीटर को प्रति लीटर पानी में मिलकार छिड़काव करना चाहिये। 

4. फल सड़न रोग: यह एक फफूंदी रोग। इस रोग के लगने के बाद कोमल फलों के डंठलों के पास धीरे-धीरे सड़ने लगता है। 

इसकी रोकथाम के लिए ब्लू कॉपर के 3 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर घोल का छिड़काव तुरन्त करें और उसके 15 दिन बाद दुबारा छिड़काव करने लाभ मिलता है। 

यदि इसके बाद भी लाभ न मिले तो एक बार फिर छिड़काव कर देना चाहिये।

कटहल के फल की तुड़ाई कब और कैसे करें

कटहल का फल साधारण तौर पर फल लगने के 100 से 120 दिन के बाद तोड़ने के लायक हो जाता है। 

फिर भी जब इसका डंठल तथा डंठल से लगी पत्तियों का रंग बदल जाये यानी हरा से हल्का भूरा या पीला हो जाये और फल के कांटों का नुकीलापन कम हो जाये तब किसी तेज धार वाले चाकू से दस सेंटीमीटर डंठल के साथ तोड़ लेना चाहिये। 

यदि फल काफी ऊंचाई से तोड़ रहे हैं तो उसे रस्सी के सहारे नीचे उतारना चाहिये वरना जमीन पर गिर जाने से फल खराब हो सकता है।

पैदावार

कटहल के बीज से बोई गई खेती में फसल 7 से 8 वर्ष में फल आने लगते हैं और कलम से लगाई गई खेती में 5 से 6 साल में फल आने लगते हैं। 

यदि अच्छी तरह से देखभाल की जाये तो एक वृक्ष से 4 से 5 क्विंटल कटहल आसानी से पाया जा सकता है। यदि एक हेक्टेयर में 150 से 200 पौधे लगाये गये हैं तो इससे प्रतिवर्ष 3 से 4 लाख रुपये तक की आमदनी हो सकती है। 

दूसरे वर्ष इसकी फसल में कोई लागत नही लगती है और फसल इससे अधिक होती है।

वैज्ञानिकों द्वारा खोजी गई कटहल की इस नई किस्म से किसानों को होगा लाभ

वैज्ञानिकों द्वारा खोजी गई कटहल की इस नई किस्म से किसानों को होगा लाभ

आईआईएचआर-बेंगलुरु के वैज्ञानिकों को यह कटहल हाल ही में बेंगलुरु के ही बाहरी क्षेत्रों के एक किसान नागराज के खेत में ही मिला। ये फसल अपने असाधारण स्वाद एवं पोषण मूल्यों के लिए जाना जाता है। भारत में किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए यहां के कृषि वैज्ञानिक दिन-रात कड़ा परिश्रम करते हैं। दरअसल, भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की अधिकांश आबादी आज भी खेती किसानी पर निर्भर रहती है। इसके चलते सरकार भी इस फिराक में रहती है, कि किसानों को किसी भी स्थिति में इतनी सहायता पहुंचाई जा सके, जिससे कि उनकी रोजी रोटी सहजता से चलती रहे। यही वजह है, कि वैज्ञानिकों ने अब एक नए किस्म के कटहल की खोज की है, आइए आज हम आपको इसके लाभ बताते हैं। बतादें कि कृषि वैज्ञानिकों की वजह से ही आज खेती किसानी काफी विकासित हुई है।

वैज्ञानिकों को मिला कटहल कैसा दिखता है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई यह नई कटहल भी किसी सामान्य कटहल की तरह खाने वाला कटहल ही है। परंतु, ये नया कटहल व्यावसायिक प्रसंस्करण के लिए अत्यंत ज्यादा अनुकूल है। इस नए कटहल को सिद्दू और शंकरा कहा जाता है। इसे मिलाकर अब तक वैज्ञानिकों ने कटहल की तीन किस्मों की खोज कर ली है। ये तीनों किस्में भारत के अंदर पाई जाती हैं। सबसे मुख्य बात यह है, कि अब तक व्यावसायिक तौर पर केवल दो किस्मों का ही उत्पादन होता था। परंतु, नई किस्म मिलने के उपरांत अब तीन किस्मों की पैदावार की जा सकेगी। ये भी पढ़े: कटहल की खेती की सम्पूर्ण जानकारी (Jackfruit Farming Information In Hindi)

वैज्ञानिकों को यह नए किस्म का कटहल कहाँ मिला है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि आईआईएचआर-बेंगलुरु के वैज्ञानिकों को ये कटहल हाल ही में बेंगलुरु के ही बाहरी इलाके के एक किसान नागराज के खेत में मिला। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह फसल अपने असाधारण स्वाद के साथ-साथ पोषण मूल्यों के लिए भी जानी जाती है। इस नई किस्म के साथ सबसे उत्तम बात यह है, कि इसकी पैदावार अन्य किस्मों से कहीं अधिक होती है। ये भी पढ़े: कटहल के फल गिरने से रोकथाम सबसे विशेष बात यह है, कि इस नए किस्म की एक कटहल का वजन तकरीबन 25 से 32 किलोग्राम तक होता है। अर्थात यदि आप कटहल की खेती कर के उससे मुनाफा कमाना चाहते हैं, तो ये नई किस्म आपके लिए सर्वाधिक अनुकूल है। वैज्ञानिकों का कहना है, कि वह किसान नागराज के साथ एक समझौता कर रहे हैं। साथ ही, कटहल की इस नवीन किस्म को और बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। यदि सब कुछ अच्छा रहा तो कुछ वर्षों में ही यह नया कटहल पूरे भारत में लगने लगेगा और प्रति वर्ष किसानों को मोटा मुनाफा प्रदान करेगा।
कम पैसे में मोटी कमाई, जानें खरबूजे की खेती करने का सही तरीका

कम पैसे में मोटी कमाई, जानें खरबूजे की खेती करने का सही तरीका

गर्मियों के सीजन में सबसे ज्यादा पसंद किये जाने फलों में से एक खरबूजा भी है. कई तरह के रोगों से बचाने वाले खरबूजे की खेती से किसान मोटी कमाई कर सकते हैं. पंजाब, यूपी, हरियाणा, महाराष्ट्र, एमपी और राजस्थान जैसे कई राज्यों में खरबूजे की खेती की जाती है. 

लेकिन इन राज्यों में खरबूजे का सबसे ज्यादा उत्पादन किया जाता है. अगर खरबूजे की खेती करने की तकनीक आधुनिक हो और बड़े पैमाने पर हो, तो किसान इससे अच्छी खासी मोटी कमाई कर सकते हैं. 

हालांकि केंद्र और राज्य दोनों ही सरकार किसानों को कृषि कार्यों में खेती और कृषि यंत्रों पर सब्सिडी देती है. अब ज्यादातर लोग नौकरी चाकरी छोड़कर कहती की ओर रुख कर रहे हैं. ऐसे में खरबूजे की खेती करना उनके लिए काफी फायदेमंद हो सकती है.

खरबूजे की खेती करने का सही तरीका

रबी सीजन के बाद जायद सीजन में खरबूजे की खेती बड़े पैमाने में की जाती है. क्योंकि रबी सीजन के बाद फसलें काट दी जाती हैं, और खेत खाली हो जाते हैं. 

जिसमें खरबूजे की बागवानी करके लाखों कमाए जा सकते हैं. गर्मियों में खरबूज खूब बिकते हैं, ऐसे में खाली पड़ी जमीन का भी इस्तेमाल हो जाता है. 

ये भी देखें: लागत कम मुनाफा ज्यादा, ऐसे करें तरबूज की खेती 

गर्मी के मौसम में खरबूजे की खेती लगभग एक हेक्टेयर के खेत में करीब दो सौ से ढ़ाई सौ क्विंटल का उत्पादन मिल सकता है. जिससे किसान इसकी एक बार की फसल से चार से पांच लाख का मुनाफा कमा सकते हैं. 

इतना ही नहीं सरकार की तरफ से खरबूजे के बीज पर 35 फीसद अनुदान दिया जाता है. अगर आप भी खरबूजे की खेती करके मोटी कमाई करना चाहते हैं, तो पहले इससे जुड़ी सभी जानकारी को जान लें, जो आपके काम आ सकती है.

जानिए खरबूजे का इस्तेमाल

खरबूजे को कद्दूवर्गीय फसल कहा जाता है. इसे नगदी फसल के रूप में उगाया जाता है. ये बेल के रूप में विकास करता है. खरबूजा खाने में मीठा और स्वादिष्ट होता है. 

इसे सलाज या इसका जूस भी पिया जा सकता है. गर्मियों में इस फल को खाने से हाइड्रेशन मिलता है. खरबूजे में 90 फीसद पानी होता है और 9 फीसद कार्बोहाइड्रेट होता है.

पौष्टिक तत्वों से भरपूर खरबूजे के बीज

खरबूजे के बीज कई तरह के पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं. खरबूजे में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फैट, फाइबर अच्छी मात्रा में मौजूद होते हैं. 

इन पोषक तत्वों के अलावा खरबूजे के बीज में और भी पोषक तत्व होते हैं, जिनमें कैल्शियम, जिंक, आयरन, मैग्नीशियम और विटामिन ए, बी भी होता है. 

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जानिए खरबूजे की किस्में

पूसा शरबती

इस किस्म के खरबूजे के छिलके का रंग गुलाबी होता है. इसकी एक बेल पर चार से पांच फल लगते हैं. इसका छिलका जालीदार और गूदा मोटा होता है.

पंजाब सुनहरी

इस तरह के किस्म के खरबूजे की बेल की लम्बाई ज्यादा होती है. यह पकने में हल्के पीले रंग का नजर आता है. इसके एक फल का वजन आधे किलो से ज्यादा होता है.

पूसा मधुरस

इस किस्म के खरबूजे गोल और गहरे ग्रे रंग के होते हैं. इसके एक फल का वजन 600 ग्राम से ज्यादा होता है. एक बेल पर कम से कम 5 से 6 खरबूजे निकलते हैं.

आईवीएमएम 3

इस किस्म के खरबूजे धारीदार और पकने के पीले रंग के हो जाते हैं. यह काफी मीठे भी होते हैं.

हरा मधु

  • इस किस्म के खरबूजे का भार कम से कम एक किलो तक होता है.  यह काफी मीठा और मोटे गूदेदार होता है.
  • वैसे देखा जाए तो खरबूजे की कई तरह की किस्में होती हैं जो ज्यादा उत्पादन देने में सक्षम होती हैं.

खेती के लिए मिट्टी, समय और मौसम

अगर आप खरबूजे की खेती करना चाहते हैं, तो इसके लिए हल्की रेतीली मिट्टी अच्छी होती है. इसके अलावा इसकी जमीन अच्छी जल निकास वाली होनी चाहिए. 

जायद के सीजन में खरबूजे की फसल सबसे अच्छो होती है. इस दौरान पौधों को पर्याप्त मात्रा उपयुक्त जलवायु मिल जाती है. खरबूजे के बीजों को अंकुरित होने के लिए शुरुआत 25 से 30 डिग्री टेम्प्रेचर की जरूरत होती है. 

जानकारी के लिए बता दें कि, खरबूजे के पौधे को बढ़ने के लिए 30 से 45 डिग्री टेम्प्रेचर की जरूरत होती है. 

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खेती के लिए कैसी हो तैयारी?

खरबूजे की खेती करने से पहले खेत की जुताई जरूरी होती है. जिसके बाद खेत को सींचा जाता है. जिसके कुछ दिनों के बाद जमीन को समतल करने के लिए पाटा किया जाता है. 

जिसके बाद बीजों की बुवाई करने के लिए क्यारियां बना ली जाती हैं. फिर इनमें जैविक और रसायनिक खाद का इस्तेमाल अच्छे से किया जाता है.

कितनी हो उर्वरक की मात्रा?

शुरुआत में 2 सौ से ढ़ाई सौ क्विंटल पुरानी गोबर की खाद को प्रति हेक्टेयर के किसाब से खेत में डाला जाना चाहिए. वहीं रासायनिक खाद में 60 किलो फास्फोरस, 40 किलो पोटाश और 30 किलो नाइट्रोजन की मात्रा का इस्तेमाल प्रति हेक्टेयर नालियों और क्यारियों मैं करना होता है. जब भी पौधे में फूल आने लगे तो, उस समय करीब 20 किलो यूरिया का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

क्या है बुवाई का सही तरीका

खरबूजे की खेती में बीजों की रुपाई और पौधा दोनों का इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर खेत एक हेक्टेयर है तो उसके लिए के से डेढ़ किलो बीजों की जरूरत होती है. 

शुरुआत में बीजों को बिमारियों का खतरा कम होता है. इन्हें क्यारियों या नालियों किसी में भी बो सकते हैं. बीजों की बुवाई करते वक्त दो फिट की दूरी रखें. 

उसके बाद तलक तकनीक से खेत की सिंचाई करें. फरवरी के महीने में खरबूजे के बीजों की रुपाई की जाती है. हफ्ते में दो सिंचाई और बारिश के सीजन में जरूरत के हिसाब से सिंचाई की जरूरत खरबूजे की खेती में होती है.

कैसे करें तुड़ाई?

खरबूजे की तुड़ाई इस बात पर भी निर्भर करती है, कि उसकी किस्म कौन सी है. खरबूजे के फल बुवाई के ढ़ाई से तीन महीने बाद तैयार हो जाते हैं. अगर खरबूजे का फल 90 फीसद पक गया है तो उसे तुरंत तोड़ लें. 

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खेती पर कितना आएगा खर्च?

एक हेक्टेयर खरबूजे की खेती पर कितना खर्च होगा, यह जान लेना वभी जरूरी है.

  • खेती का खर्च एक हजार रुपये.
  • दो से तीन किलो बीज का खर्च करीब तीन हजार रुपये.
  • खेत की तैयारी, रोपाई और खाद का खर्च करीब छह हजार रुपये.
  • मजदूरी और खरबूजा तुड़ाई का खर्च करीब तीन हजार रुपये.
  • कीटनाशक का खर्च करीब 13 से 15 हजार रुपये.

क्या मिलेगा फायदा?

एक हेक्टेयर के खेत में खेती करने से करीब दो सौ से ढ़ाई सौ क्विंटल का उत्पादन होता है.बाजार में खरबूजा 15 से 30 रुपये प्रति किलो बिकता है. इसकी फसल से एक बार में करीब ढ़ाई से चार लाख तक कमाई की जा सकती है. 

इसके अलावा इसके बीजों को बेचकर भी कमाई की जा सकती है. करीब 6 क्विंटल बीजों का उत्पादन 15 हजार रुपये क्विंटल तक बिकता है. इसकी आय में खर्चे को हटाने के बाद भी अच्छा खासा मुनाफा होता है.

कटहल की लोकप्रियता की वजह से इसके ऊपर फिल्म तक बन चुकी है

कटहल की लोकप्रियता की वजह से इसके ऊपर फिल्म तक बन चुकी है

कटहल की लोकप्रियता का आंकलन इस बात से लगाया जा सकता है, कि इस पर फिल्म भी बनी है। इस लेख में हम आपको इसकी खेती और इससे होने वाले फायदों के संदर्भ में बताएंगे। हमारे भारत में तकरीबन हर दूसरा इंसान कटहल की सब्जी अथवा अचार का प्रेमी होता है। इसकी लोकप्रियता का आंकलन सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है, कि इसपर 'कटहल' नाम की फिल्म तक भी रिलीज हो चुकी है। इस फिल्म की कहानी कटहल की चोरी पर आधारित है। यदि फिल्म की बात की जाए तो उसमें विधायक के घर से दो कटहल चोरी होते हैं। यह दो कटहल उस विधायक के लिए क्या अहमियत रखते हैं, यह आप फिल्म देखकर ही जा सकते हैं। इसी कड़ी में आज हम आपको कटहल की खेती कब और कैसे होती है, इसके संदर्भ में जानकारी देने जा रहे हैं। साथ ही, हम आपको यह भी बताएंगे कि इससे एक वर्ष में कितनी आय हो सकती है।

कटहल की बिजाई हेतु उपयुक्त समय

दरसअल, कटहल की विभिन्न प्रजातियां होती हैं। 'विएतनाम सुपर अर्ली' को छोड़कर एक एकड़ खेत में बाकी प्रजातियों के 140 कटहल के पौधे रोपे जा सकते हैं। साथ ही, एक एकड़ में विएतनाम सुपर अर्ली किस्म के लगभग 250 पौधे लग जाते हैं। सभी पौधों को कम से कम 15 फीट के फैसले पर खेत में लगाया जाता है। जानकारी के अनुसार, पौधा रोपण के पांच साल उपरांत कटहल की पैदावार शुरू हो जाती है। खेत में इसके पौधों के रोपण का समुचित समय अप्रैल से अगस्त के मध्य होता है। यदि खेत में पानी की दिक्कत नहीं है, तो आप इसको किसी भी सीजन में लगा सकते हैं। क्योंकि कटहल की पैदावार के लिए प्रचूर मात्रा में जल की जरुरत पड़ती है।

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कटहल के फल गिरने से रोकथाम

पौधों को साफ जल की जरूरत पड़ती है

अब यहां ध्यान देने योग्य बात यह है, कि कटहल के पौधों को सिर्फ साफ पानी दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, जिस जगह पर कटहल का पौधा रोपण किया गया है। वहां पानी की मात्रा अधिक नहीं होनी चाहिए। बतादें, कि चार साल के उपरांत कटहल का एक पौधा तकरीबन 25 किलो फल देना चालू कर देता है। इसके पश्चात पेड़ पर क्विंटल के हिसाब से पैदावार मिलती है। इसका अर्थ यह है, कि जितना पौधा फैलेगा और बढ़ेगा वह उतना ही अधिक उत्पादन देगा।

कटहल से आप कितनी आय अर्जित कर सकते हैं

फिलहाल, यदि कमाई की बात की जाए तो पांच साल के उपरांत एक पौधे से करीब 80 किलो कटहल की पैदावार हो सकती है। ऐसी स्थिति में 250 पौधों से कम से कम 20,000 किलो कटहल निकलेंगे। साथ ही, बाजार में कम से कम 40 रुपये किलो कटहल का भाव मिल जाता है। इसी प्रकार आप एक एकड़ में कटहल का पौध रोपण पांच वर्ष के पश्चात तकरीबन आठ लाख रुपये तक का मुनाफा अर्जित कर सकते हैं। विशेष बात यह है, कि सरकार की ओर से इसके पौधों पर अच्छा-खासा अनुदान भी दिया जाता है। जिससे किसानों को लागत में भी काफी हद तक राहत मिल पाएगी।
कीवी की खेती से प्रति हेक्टेयर कितने लाख की आमदनी की जा सकती है

कीवी की खेती से प्रति हेक्टेयर कितने लाख की आमदनी की जा सकती है

भारत में किसान सबसे ज्यादा कीवी की एबॉट, एलीसन, बू्रनो, मोंटी, टुमयूरी और हेवर्ड प्रजाति की खेती करते हैं। क्योंकि, यह प्रजातियां यहां की जलवायु के अनुकूल हैं। कीवी एक विदेशी फल है। परंतु, वर्तमान में भारत के अंदर भी इसकी खेती चालू हो चुकी है। कीवी का सेवन करने से शरीर को भरपूर मात्रा में विटामिन एवं पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। कीवी एक एंटी-ऑक्सीडेंट एवं एंटी-इंफ्लेमेटरी फल है। इसको खाने से शारीरिक रोग प्रतिरोध क्षमता बढ़ जाती है। इसमें राइबोफ्लेविन, बीटा कैरोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फॉस्फरोरस, कॉपर, विटामिन बी, विटामिन सी, कैल्शियम, फाइबर, पोटैशियम और जिंक समेत विभिन्न पोषक तत्व पाए जाते हैं। यही कारण है, कि डेंगू से प्रभावित मरीजों को चिकित्सक कीवी खाने की राय देते हैं।

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कीवी की इन राज्यों में बड़े पैमाने पर खेती की जाती है

दरअसल, कीवी चीन की मुख्य फसल है। परंतु, भारत में अब कीवी की खेती चालू हो चुकी है। केरल, सिक्किम, मेघालय, अरूणाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, नागालैंड और उत्तराखंड में किसान बड़े पैमाने पर इसकी खेती कर रहे हैं। यदि किसान भाई कीवी की खेती करते हैं, तो कम वक्त में ज्यादा मुनाफा उठा सकते हैं। ऐसी स्थिति में कीवी का भाव काफी ज्यादा होता है। यह सेब एवं संतरा की तुलना में बेहद महंगा बिकता है। इसके बावजूद भी इसकी बिक्री काफी ज्यादा होती है।

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कीवी की खेती किस तरह करें

जैसा कि उपरोक्त में बताया भारत में किसान सबसे ज्यादा कीवी की एलीसन, बू्रनो, मोंटी, टुमयूरी, हेवर्ड और एबॉट किस्म की खेती करते हैं। क्योंकि यह प्रजातियां यहां की जलवायु के अनुकूल हैं। कीवी की खेती के लिए सर्दी का मौसम सबसे उपयुक्त होता है। जनवरी माह में इसके पौधे लगाने पर विकास बेहतर होता है। यदि किसान भाई कीवी की खेती करना चाहते हैं, तो इसके लिए बलुई रेतीली दोमट मिट्टी अच्छी होती है। साथ ही, इसके बाग के अंदर इसके खेत में जल निकासी की उत्तम व्यवस्था होनी चाहिए। इससे वृक्षों पर फल शीघ्रता से आने चालू होते हैं।

कीवी की खेती से वर्ष में कितने लाख का मुनाफा हो सकता है

यदि किसान भाई चाहें, तो अपने बाग में बडिंग विधि अथवा ग्राफ्टिंग विधि से भी कीवी के पौधे रोप सकते हैं। इसके लिए सर्वप्रथम खेत में गड्ढे खोदने पड़ेंगे। इसके पश्चात गड्ढों में लकड़ी का बुरादा, सड़ी खाद, कोयले का चूरा, बालू और मिट्टी डाल दें। इसके पश्चात चीकू के पौधे की बिजाई करें। इससे आपको उत्तम उत्पादन मिलेगा। कीवी की विशेष बात यह है, कि कीवी के फल शीघ्रता से खराब नहीं होते हैं। तोड़ाई करने के पश्चात आप इसके फल को 4 माह तक प्रिजर्व कर के रख सकते हैं। अगर आप एक हेक्टेयर में कीवी की खेती करते हैं, तो प्रतिवर्ष 12 से 15 लाख रुपये तक की आमदनी होगी।
मैनेजर की नौकरी छोड़ की बंजर जमीन पर खेती, कमा रहे हैं लाखों

मैनेजर की नौकरी छोड़ की बंजर जमीन पर खेती, कमा रहे हैं लाखों

पढ़ाई के बाद मैनेजर के रूप में करियर शुरू करने वाले हिमाचल के मनदीप के लिए, खेती की तरफ लौटना उनके लिए एक ऐसे सपने की तरह था इसके बारे में उन्होंने कभी नहीं सोचा था, लेकिन कहते हैं ना कभी-कभी कुदरत ही आपके लिए अपने आप कुछ कर देती है और मनदीप वर्मा के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ. लगभग 5 साल तक एक जानी-मानी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने के बाद एक दिन अचानक मनदीप वर्मा ने अपने परिवार के साथ अपने शहर सोलर वापस आने का फैसला कर लिया. सोलन लौटकर मनदीप ने कुछ ऐसा किया जो उनके कामकाज और पढ़ाई से मेल नहीं खाता था और वह था घर में अपने बंजर जमीन पर खेती करने के बारे में सोचना. मनदीप वर्मा खेती के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे लेकिन वह एक बात को लेकर एकदम क्लियर थे कि उन्हें किसी भी तरह की परंपरागत खेती नहीं करनी है.  कुछ अलग करने की सोच नहीं उन्हें हॉर्टिकल्चर (Horticulture) की तरफ खींचा. उसके बाद मनदीप शर्मा ने हॉर्टिकल्चर में जो किया उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है। 

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 सबसे पहले मनदीप वर्मा ने अपने आसपास के इलाके के मौसम के बारे में पूरी तरह से जानकारी ली और उसके बाद इस पर खेती करने से पहले अपने एरिया में यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर से मुलाकात की. पूरी तरह से जानकारी मिल जाने के बाद उन्होंने फैसला किया कि वह अपनी जमीन पर कीवी  की खेती करेंगे । मनदीप वर्मा ने बताया कि उन्होंने कीवी के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए लाइब्रेरी में काफी समय व्यतीत किया था। उन्होंने कई किताबें पढ़ी और कृषि पर भी विभिन्न प्रोफेसरों से बातचीत की। उन्हें इस जानकारी के बाद कीवी की खेती (Kiwi Farming) शुरू करने का फैसला लिया। 

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 मनदीप वर्मा ने बताया कि उन्होंने सोलन के उद्यानिकी विभाग से बात की थी और 2014 में 14 बीघे की जमीन पर कीवी गार्डन बनाने का काम शुरू किया था। इस गार्डन में उन्होंने कीवी की उन्नत किस्में लगाई थीं। साल 2017 में उन्होंने कीवी की आपूर्ति के लिए वेबसाइट पर ऑनलाइन बुकिंग शुरू की थी। इस वेबसाइट पर वह फल को कब तोड़ा जाना है, कब उसे डिब्बे में पैक किया जाना है, ऐसी सभी जानकारियां उपलब्ध कराते थे। उनके इन फलों को हैदराबाद, बैंगलोर, दिल्ली, उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा में ऑनलाइन बेचा जाता है। इसके अलावा मनदीप वर्मा ने इस फसल को तैयार करने में ऑर्गेनिक तरीका अपनाया है। इसके लिए खाद आदि उन्होंने खुद ही तैयार किया।